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महिला ई-हाट

श्रीमती कृष्णा राज

माननीय राज्य मंत्री, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय

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pic-1पिटारा : बात चीत - हमारी बात

पिटारा : बात चीत - हमारी बात

 

अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस, जिसे आरंभ में अंतरराष्‍ट्रीय कामकाजी महिला दिवस कहा जाता था, संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा द्वारा वर्ष 1977 में सभी सदस्‍य देशों को 8 मार्च को संयुक्‍त राष्‍ट्र महिला अधिकार एवं विश्‍व शांति दिवस के रूप में घोषित करने के लिए आमंत्रित करने के बाद, प्रत्‍येक वर्ष 8 मार्च को मनाया जाता है।

यह वह दिन होता है जब महिलाओं को राष्‍ट्रीय, नस्‍ली, भाषायी, सांस्‍कृतिक, आर्थिक अथवा राजनैतिक विभाजन के बिना उनकी उपलब्‍धियों के लिए सम्‍मानित किया जाता है।
*स्रोत : संयुक्‍त राष्‍ट्र एवं विकीपीडिया

महिला दिवस की पूर्व संध्‍या पर महिला ई-हाट के उद्घाटन का उद्देश्‍य महिला उद्यमियों को उनके उत्‍पाद प्रदर्शित करने के लिए ऑनलाइन विपणन मंच  उपलब्‍ध करा कर उनका सशक्‍तीकरण करना और अर्थव्‍यवस्‍था में उनकी भागीदारी को सुदृढ़ करना है।

कविता

हौसले के पंख

मजबूत करो इतने
कि हर उड़ान की मंजिल
आसमान बन जाये ।
याचक नहीं दाता हो
अपने आप को पहचानो
दया की पात्र नहीं
समाज की आन हो
उठो गर्व से कहो
तुम भारत का मान हो ।
स्‍वंय को साधो
सिद् करो इतना
कि भाग्‍य कहे
तुम हो
मेरी विधाता ।”
 

सुश्री संगीता गुप्‍ता द्वारा, एक चित्रकार, कवियत्री, फिल्‍म निर्माता, प्रशासनिक अधिकारी जिनकी कविताओं, लघु कहानियों एवं फोटोग्राफ की 9 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और 7 वृत्‍तचित्र रिलीज हो चुके हैं और आप कला एवं संस्‍कृति को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक गतिविधियां कर रही हैं।


नील का आकर्षण

नील-श्वेत रचना का चुंबकीय आकर्षण होता है। 

जब नील और श्वेत रचनाओं का आकर्षण अपने चरम पर हो तब प्राकृतिक और पौधों पर आधारित नील के प्रयोग की धीमी प्रक्रिया और रासायनिक डाई की तुलना में उसके अधिक गुणों पर विचार करना रूचिकर विषय बन जाता है। 

राष्ट्रीय और वैश्विक स्तरों पर डिज़ाइनर लगातार इस विषय पर काम कर रहे हैं। खुदरा विक्रेता कठिनाई के दौर से गुज़र रहे नील के कलैक्शन के लिए कठिन प्रयास कर रहे हैं। कोई भी परिधान खरीद कर पहन लो और तारीफों के पुल बँध जाते हैं। यह जादू तभी तक बरकरार रहता है जब तक कि उस कपड़े को धोया नहीं जाता है। तब शंकाओं का दौर शुरू होता है: रंग बरकरार रहता है, हर धुलाई के बाद और ज्यादा चलता है। कोई डाई नहीं, खुद करके देखें जैसी सलाहों से मदद मिलती है। कई बार तो कपड़े की धुलाई का भी इंतजार नहीं करना पड़ता है।

कटु सत्य यह है कि खुदरा क्षेत्र में कृत्रिम और रासायनिक नील का ही प्रयोग किया जाता है।

प्राकृतिक डाइयों से काम करने का कष्ट उठाने वालों को रासायनिक नील की तुलना में कठिनाइयों के दौर से गुजरना पड़ता है। जानकारियों के अभाव के कारण उपभोक्ताओं को धोखे में रखा जाता है। पौधों पर आधारित नील की तुलना में रासायनिक स्रोत से प्राप्त कृत्रिम नील कम महँगा होता है।

हाल के वर्षों तक कडपा बड़े नील के खेत पर गर्व किया करता था। “एक विदेशी ने वह खेत खरीद लिया और वह किसान अब खुदरा विक्रेता बन गया है।" यही है नील की विडंबना।

पौधे पर आधारित नील की एक किलो की टिकिया की लागत 2,000 रुपए तक होती है।

नील का सबसे ज्यादा लोकप्रिय स्रोत तमिलनाडु है।

नील की टिकियाएं कुंडों में रखी जाती हैं और फिर ऐश वाटर, लाइम तथा अन्य घटकों से उन्हें संसाधित किया जाता है। यह तरल हरे रंग का होता है। “जब कोई कपड़ा उसमें डुबोकर बाहर निकाला जाता है और वह कपड़ा हवा के संपर्क में आता है तब ऑक्सीकरण होने से उसका रंग नीला हो जाता है। इसीलिए लोग नील को जादुई डाई कहते हैं।

श्रम-सघन प्रक्रिया

"आपकी पीठ, बाँहों पर कहीं भी नील के धब्बे पड़ सकते हैं, यदि वह रासायनिक हो। खेती करने से लेकर रंग निकालने तक, यह एक लंबी प्रक्रिया है। कपड़े में रंग की गहराई इस बात पर निर्भर करती है कि उस कपड़े को कितनी बार डाई में डुबोया गया है। गहरी आभा पाने के लिए कपड़े को 15 से 20 बार तक डाई में डुबोना पड़ सकता है। नील जिस प्रकार कार्य करता है, उसे देखकर मैं आज भी चमत्कृत हो जाता हूँ। इसमें कई चीज़े काम करती हैं। जब आपको नील की टिकियाएं मिलती हैं तब आपको उनमें अशुद्धियों की जाँच करती पड़ती है। कल्पना कीजिए कि आप शिबोरी पैटर्न वाले कपड़े पर डाई से कार्य कर रहे हैं और अपने कार्य के अंतिम चरण में आपको यह पता चलता है कि रंग में मिट्टी मिश्रित है, लेकिन ऐसा बहुधा हुआ करता है। सभी शिल्पियों को यह जानकारी और विश्वास है कि जब प्राकृतिक रंगों को विधिवत लगाया जाता है तब वे निकलते नहीं हैं। “कपड़े को ब्लॉक प्रिंटिंग के विभिन्न चरणों में भी कुछेक बार धोया जाता है, इसलिए रंग निकलने की घटना कभी भी हो सकती है। थोड़ा भी अतिरिक्त रंग धुल कर निकल जाता है। प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल से तैयार उत्पाद के रंग निकलने नहीं चाहिएं। रंग को गर्म मौसम में दो दिन और ठंडे मौसम में चार से पाँच दिन तक सूखने दें।

नील को आसानी से नाजुक रंग कहा जा सकता है। इसे तैयार और डाई करने के समय भी प्यार और सम्मानपूर्वक संसाधित किया जाना चाहिए। इस प्रकार संसाधित किए जाने पर ही इसका छुपा हुआ जादू निखरकर बाहर आता है।

धीमा फैशन

तमिलनाडु के पॉकेटों, तेलंगाना, आँध्र प्रदेश, गुजरात और राजस्थान में परंपरागत तकनीकों का इस्तेमाल करने वाले बुनकर और ब्लॉक प्रिंटर प्राकृतिक नील का प्रयोग करते हैं। दो वर्ष पहले कच्छ के टैक्स्टाइल ट्रेल में भुजोड़ी में बुनकरों के वनकर परिवार द्वारा नील कुंडों का सावधानीपूर्वक प्रयोग देखा एवं समझा गया। कताई, बुनाई और रंगाई की ‘विधियां’ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँची। कच्छ में अजरखपुर और धमाड़का के ब्लॉक प्रिंटर प्राकृतिक डाई लगाने की धीमी प्रक्रिया का पालन करते हैं। वे यह कार्य तब से करते चले आ रहे हैं जब कि स्थायी और धीमे फैशन जैसे शब्द प्रचलित भी नहीं हुए थे। तथापि, कई प्रिंटरों ने अधिक कमाई और कम समयावधि में नए कलैक्शन तैयार करने के लिए स्क्रीन प्रिंटिंग और रासायनिक डाइयों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।

ऐतिहासिक संबंध

अन्य सभी प्राकृतिक डाइयों की तरह नील का प्रयोग कई युगों से होता रहा है। हाल के वर्षों में स्वदेशी और हाथ से बुने कपड़ों तथा तकनीकों में रूचि बढ़ने से नील मुख्यधारा में आ गया है। नील का भारत से भावनात्मक संबंध है।

नील का पौधा पूरे स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश शोषण का स्थायी प्रतीक रहा है। इसके कारण किसानों को ब्रिटिश राज की अन्यायपूर्ण कार्य-पद्धतियों का विरोध करना पड़ा। महात्मा गाँधी ने बिहार के चम्पारण में नील किसानों पर लागू की गई तिनकथिया व्यवस्था की ब्रिटिश नीति के विरुद्ध अपना पहला सत्याग्रह शुरू किया। तब चम्पारण नील की खेती का सबसे प्रमुख स्थान हुआ करता था। यही सत्याग्रह आगे चलकर चम्पारण सत्याग्रह के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

बिहार में चम्पारण आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम में उस आंदोलन का महत्त्व इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।

क्या कोई खरीदार प्राकृतिक नील से रंगे गए कपड़े और रासायनिक नील से रंगे गए कपड़े में फर्क बता सकता है? “यदि विक्रेता न बताए तो यह जानने का कोई तरीका नहीं है। प्राकृतिक नील से रंगे गए कपड़े अपनी श्रम सघन प्रक्रिया के कारण सस्ते नहीं होंगे। ब्लॉक प्रिंट किए हुए एक मीटर नील कपड़े की लागत 650 रुपए प्रति मीटर हो सकती है। सही तकनीक से प्राकृतिक नील का प्रयोग करने वाले कपड़े के रंग निकलते नहीं हैं। लंदन स्थित विक्टोरिया एंड एल्बर्ट म्यूज़ियम में भारत के शताब्दियों पुराने कलमकारी टैक्स्टाइल रखे हुए हैं, जिनमें मैडर और इंडिगो का इस्तेमाल किया गया है। नील से रंगे कपड़ों के कई संवेदनशील और जानकार ग्राहक जापान और अमेरिका में हैं। शुद्धता और प्रामाणिकता की चाहत ही है, जो कि प्राकृतिक रंगों की खूबसूरती को बनाए रखने में मददगार होगी। हम भारतीयों का इस यात्रा में आपनी भूमिका निभाते रहना आवश्यक होगा।

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नील रंग के ब्लॉक

सदाबहार साड़ी

शायद भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय परंपरागत परिधान साड़ी है जो बहुत प्रकार के कपड़ों, फेब्रिक्‍स, रगों, पैटर्नों, रुपांकनों, डिजाइनों और बहुमूल्‍य जरी, मनकों एवं नगीनाकारी आदि का उपयोग कर बनाई जाती है ।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी व्‍यक्‍तिगत शैली क्‍या है, भारत में उपलब्‍ध बेहद सुन्‍दर भारतीय साड़ियों के बड़े संग्रह को देखते हुए यह निश्चित है कि आपको ऐसी सुन्‍दर साड़ी मिल ही जाएगी जो आपकी रुचि से मेल खाती हो, और सबसे अच्‍छी बात यह है कि साड़ी लगभग सभी अवसरों पर पहनी जा सकती है चाहे वह विवाह समारोह हो, औपचारिक पार्टी हो, पारिवारिक मिलन समारोह हो, अथवा और कोई समारोह हो ।

आइए, भारत में साड़ी बनाने में उपयोग किए जाने वाले विभिन्‍न फैब्रिक्‍सों पर नजर डालते हैं -

1. सूती साड़ियां - सूती साड़ियां हमेशा पहनी जाने वाली साड़ियां होती हैं जो कभी भी चलन से बाहर नहीं होती हैं विशेषकर भारत के उन भागों में जहां गर्मी के महीनों में गरमी असहनीय हो जाती है । हल्‍की, हवादार एवं आरामदायक सूती साड़ियां देश के लगभग सभी भागों में पहनी जाती हैं।

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पश्चिम बंगाल की ग्रामीण महिलाओं द्वारा निर्मित कढ़ाईदार सूती साड़ी

2. सिल्‍क की साड़ियां - सिल्‍क की भारी साड़ियां भारत में बेहद लेाकप्रिय हैं और महिलाओं द्वारा विशेषरूप से शादी, आदि जैसे समारोहों में पहनी जाती हैं । अनेक प्रकार की सिल्‍क की साड़ियां उपलब्‍ध हैं । इनमें से कुछ इस प्रकार हैं :

  • बालूचारी सिल्‍क - पश्‍चिम बंगाल में उत्‍पन्‍न हुई बालूचारी सिल्‍क की साड़ियां अपने सुन्‍दर, जीवन के रुपकांकों से अधिक एवं भड़कीले रंगों के लिए जानी जाती हैं ।
  • बनारसी सिल्‍क की साड़ियां – ये बनारसी सिल्‍क की साड़ियां वाराणसी में तैयार की जाती हैं और पूरे देश में मशहूर हैं । इन बनारसी सिल्‍क की साड़ियों की सबसे अधिक आकर्षित करने वाली विशेषता लोकप्रिय जाल बेल-बूटा, भारी जरी बेल-बूटा (सोना अथवा चांदी) के साथ-साथ मुगलीय रुपांककों को दर्शाती रुचिकर आकृतियां हैं । कभी भी चलन से बाहर न होने वाली, ये सुन्दर, उत्‍कृष्‍ट एवं मनोहारी साड़ियां निश्‍चित रूप से निवेश करने योग्‍य हैं ।
  • कांचीपुरम सिल्‍क की साड़ियां - तमिलनाडु जैसे दक्षिण भारतीय राज्‍य, जो कांचीपुरम सिल्‍क का जन्मस्‍थल माने जाते हैं, सुन्‍दर, उत्‍कृष्‍ट एवं विशुद्ध, उच्‍च गुणवत्‍ता वाली सिल्‍क की साड़ियों का केंद्र माने जाते हैं । कांचीपुरम सिल्‍क की साड़ियां अपनी उत्‍कृष्‍टता, सिल्‍क से बुनी हुई जरी वाली किनारी जिसमें फूलों आदि का रूपांकन होता है, के लिए मशहूर हैं । कांचीपुरम जरी वाली सिल्‍क की साड़ियां दिखने एवं छूने में इतनी वैभवपूर्ण एवं उत्‍कृष्‍ट होती हैं कि वे एक आदर्श वैवाहिक पोशाक बनाती हैं ।
  • पैठानी सिल्‍क की साड़ियां – पैठानी सिल्‍क की साड़ियां औरंगाबाद, महाराष्‍ट्र के एक छोटे से कस्‍बे में तैयार की जाती हैं । इन साड़ियों की सबसे खास डिजाइन में पेड़ों, पौधों एवं पक्षियों के सुन्‍दर प्रकृति-आधारित रूपांकन शामिल होते हैं । ये साड़ियां बहुत ही सौम्‍य, सुनहरे बेस के साथ दिखने में चमकीली और मनोहारी सिल्‍क पैटर्न में होती हैं ।
  • मैसूर सिल्‍क साड़ियां कर्नाटक की दूसरी प्रसिद्ध सिल्‍क साड़ियां हैं ।

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बिहार की महिलाओं द्वारा निर्मित मधुबनी सिल्क साड़ी

3. बंधानी साड़ियां – बंधानी साड़ियां बंधेज रंगाई तकनीक का उपयोग करके बनाई जाती हैं जो सूती फेब्रिक्‍स पर सुन्‍दर एवं आकर्षक पैटर्न सृजित करती हैं । चमकीली, रंगीन, एवं आकर्षक बंधानी साड़ियां गुजरात और राजस्‍थान राज्‍यों में बनाई जाती हैं । साड़ियों के अलावा, बंधानी सामग्री का उपयोग दुपट्टा, पगड़ी आदि बनाने के लिए भी किया जाता है । इसके अलावा, जामनगर एवं राजकोट की घारचोला साड़ियां भी काफी मशहूर हैं । सामन्‍यत: इन साड़ियों में मोर आदि के छोटे-छोटे रूपांकन होते हें और सुनहरे धागे होते हैं ।

4. पटोला साड़ियां – हाथ से बनाई गई इन हथकरघा साड़ियां की उत्‍पत्‍ति गुजरात के पाटन कस्‍बे से हुई और ये रेसिस्‍ट-डाइंग तकनीक का उपयोग कर बनाई जाती हैं । इन पटोला साड़ियों की कुछ प्रमुख लोकप्रिय डिजाइनों में आकृतियां, फूल, पक्षी आदि शामिल हैं । पटोला सिल्‍क साडियां बहुत सुन्‍दर होती हें और ऐसे बुनकरों द्वारा बनाई जाती हैं जिन्‍होंने अपनी कला में महारत हासिल कर ली है । सामान्‍यत:, जटिल डिजाइन होने के कारण एक उत्‍कृष्‍ट पटोला साड़ी बनाने में कई महीने लग जाते हैं । शामिल किए गए रंगों में लाल, हरा, काला एवं पीला आदि रंग शामिल हैं ।

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राजस्थान की राजपूत महलाओं द्वारा निर्मित एवं गोटापट्टी के काम के साथ जारजट साड़ी

5. गडवाल साड़ियां – आंध्र प्रदेश की हाथ से बुनी गई गडवाल साड़ियां सूत, सिल्‍क और जरी का उपयोग कर तैयार की जाती हैं । किनारी में सामान्‍यत: मोर आदि का रूपांकन होता है और ये समुद्री हरा, भूरा, धूमिल सफेद आदि जैसे हल्‍के रंगों में होती हैं ।

6. जरदोजी साड़ियां – सुनहरी कशीदाकारी तकनीक का उपयोग कर बनाई गई शानदार एवं सदाबहार जरदोजी साड़ियां प्रसिद्ध हैं । यदि ऐसी कोई साड़ी है जो लड़की के विवाह के साज-सामान का हमेशा हिस्‍सा होनी चाहिए, तो वह है जरदोजी साड़ी, इसकी खरी सुन्‍दरता का शुक्रिया ।

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पश्चिम बंगाल की महिलाओं द्वारा निर्मित कठियाबारी साड़ी

7. कोटा साड़ियां – राजस्‍थान के कोटा की कोटा साड़ियां सूती साड़ियों की अन्‍य एक किस्‍म, हैं जो गर्मी के महीनों के लिए उपयुक्त हैं । ‘कोटा डोरिया’ के नाम से भी जानी जाने वालीं, ये साड़ियां सूत अथवा सूत/सिल्‍क की बुनावट से तैयार की जाती हैं । चूंकि कोटा साडियों की महीन बुनावाट होती है, ये बहुत ही हल्की एवं हवादार होती हैं ।

8. जमवार साड़ियां – मशहूर जमवार साड़ियां उत्‍तर प्रदेश राज्‍य से आती हैं । ये साड़ियां सिल्‍क के सुनहरी जरी धागे के बेल-बूटों का उपयोग कर बुनी एवं सजाई जाती हैं । जमवार साड़ी की सबसे परिभाषित विशेषता साड़ी का पिछला भाग होता है जो धागों का सुन्‍दर व्‍यूह दर्शाता है जो सिल्‍क की साड़ियां बुनने के लिए उपयोग किए जाते हैं ।

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पश्चिम बंगाल की महिलाओं द्वारा निर्मित सूती साड़ी

9. चन्‍देरी साड़ियां – चन्‍देरी साड़ी की उत्‍पत्‍ति मध्‍य प्रदेश राज्‍य से हुई है । सामान्‍यत:, महीन सूत या सिल्‍क का उपयोग कर बनाई गई इन साड़ियों में चन्‍देरी मंदिरों का पैटर्न समाहित होता है ।

10. माहेश्‍वरी साड़ियां – सूती एवं सिल्‍क की माहेश्‍वरी साड़ियां सुन्‍दर सुनहरी, जरी के गोटे वाली होती हैं ।

इनके अलावा, अन्‍य किस्‍म की साड़ियां भी हैं जो जटिल दस्‍तकारी, कशीदाकारी दर्शाती हैं जैसे कि उत्‍तर प्रदेश की चिकनकारी, कर्नाटक की कसूती, ओडिशा, गुजरात एवं राजस्‍थान की एप्‍लीक, पंजाब की फुलकारी और जम्‍मू व कश्‍मीर की लंबी एवं छोटी सिलाई की हुई कशीदाकारी कुछ नाम हैं ।

भारत में हाथ से बुने कपड़े

हाथ से बुने भारतीय कपड़े प्राचीन काल से जाने जाते हैं । 

ऐतिहासिक साक्ष्‍य

यद्यपि भारत प्राचीन काल से ही सभ्‍य संसार के अधिकांश भागों में कपड़ों का निर्यातक के रूप में मशहूर था, परंतु अब वास्तविक पूर्वकालीन रंगे अथवा छींटदार कपड़ों से कुछ ही बचे हुए हैं। ऐसा, जैसा कि बताया गया है, भारत में गर्मी, नम जलवायु और मानसून की मौजूदगी के कारण हुआ । इसलिए यह आश्‍चर्यजनक नहीं है कि मिश्र जहां की जलवायु असाधारण रूप से शुष्‍क है, साक्ष्‍य देगा जिनका भारत में अभाव है । सबसे पुराना हंस की डिजाइन वाला भारतीय कपड़े का टुकड़ा काहिरा के नजदीक एक स्‍थान पर खुदाई में मिला जहां पर रेगिसतान की गर्म शुष्‍क रेत परिरक्षक का कार्य करता था ।

इसके बाद, महीन बुने हुए और मजीठ-रंगे हुए सूती कपड़े और शटलें मोहनजोदड़ो (सिंधु घाटी सभ्‍यता) के खुदाई किए गए कुछ स्‍थलों पर मिले । मध्‍य एशिया के बर्फीले पानी में सर ऑरेल स्‍टीन द्वारा भारतीय फूलदार छींट, 18वीं सदी ए.डी. में खोजी गई थी । साक्ष्‍य दर्शाते हैं कि भारत की सभी कलाएं एवं शिल्‍पें, परंपरागत हथकरघा वस्‍त्र संभवत: सबसे पुराने हैं ।

हथकरघा सबसे बड़ा कुटीर उद्योग

हथकरघा एक महत्‍वपूर्ण शिल्‍प उत्‍पाद हैं और इसमें देश का सबसे बड़ा कुटीर उद्योग शामिल है । देश भर में लाखों करघे सूत, सिल्क एवं अन्‍य प्राकृतिक तन्‍तुओं की बुनाई में लगे हुए हैं । ऐसा मुश्‍किल से ही कोई गांव होगा जहां बुनकर न हों, प्रत्‍येक गांव भारत की अपनी अमूल्‍य विरासत की परंपरागत सुन्‍दरता को बुनता है ।

भारतीय विरासत

हथकरघा जगत में, तमिलनाडु का मद्रासी चौखाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा का इकात, गुजरात एवं राजस्‍थान की बंधेजी रंगाई, बनारस के जरी वस्‍त्र, उत्‍तर प्रदेश का जेकार्ड, पश्‍चिम बंगाल का डकाई और पंजाब के फुलकारी उल्लेखनीय हैं । फिर भी, इस क्षेत्रीय विशिष्टता के बावजूद भी, इनके बीच तकनीकी एवं शैलीगत आदान-प्रदान होता रहा है ।

प्रसिद्ध कोयम्‍बटूर की साड़ियों का विकास मध्‍य प्रदेश की चन्‍देरी पैटर्न की अनुकरण करके हुआ है । डकाई साड़ियां अब बंगाल में बुनी जाती हैं न कि ढाका में । अतिरिक्‍त प्रवाहित बाने जो फेब्रिक में ही समा जाते हैं, वाली साटन बुनाई की तकनीक पर आधारित सूरत तन्‍चोई बनारस में फिर से उत्‍पादित की जाती है । अपनी परंपरागत बुनाई के अलावा, शायद ही बुनाई की कोई शैली होगी जिसका फिर से उत्‍पादन बनारस न कर सकता हो । सिल्‍क के सीधे धागे से सादा बुने गए फेब्रिक जरी वस्‍त्र की बालूचरी तकनीक, जो पश्‍चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में शुरू हुई थी, ने बनारस में जड़ें जमा ली हैं । उनके शिल्‍पकारों ने जमदानी तकनीक भी उधार ली है ।

ऊन की बुनाई कुछ कमतर जटिल नहीं है । कश्‍मीरी बुनकर अपनी पशमीना एवं शहतूश शालों के लिए पूरे विश्‍व में जाने जाते हैं । ये शालें अविश्‍वसनीय रूप से हल्‍की एवं गर्म होती हैं ।

कश्‍मीर एवं कर्नाटक अपने शहतूत से बने रेशम के लिए जाने जाते हें । विश्‍व में भारत ही एक मात्र देश है जो सभी चारों प्रकार की व्‍यावसायिक रेशम – शहतूत, टसर, एरी और मूंगा का उत्‍पादन कर रहा है । आजकल संयुक्त राज्‍य अमेरिका और यूरोप में लोकप्रिय हो रही टसर बिहार, मध्‍य प्रदेश, ओडिशा, पश्‍चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और उत्‍तर प्रदेश के जंगलों में पाई जाती है । कच्‍चे रेाशम की एक अन्‍य किस्‍म एरी है। एरी मुलायम होती है और इसमें ऊन जैसी चमक होती है ।

असम एरी और मूंगा रेशम की जन्‍म स्‍थली है । मूंगा रेशम टिकाऊ होती है और प्रत्‍येक धुलाई इसके सुनहरे पीले रंग और दुर्लभ चमक को और अधिक चमकदार बना देती है । असम, त्रिपुरा एवं मणिपुर में उपयोग की जाने वाली डिजाइनें अधिकांशत: शैली के अनुरूप प्रतीक, तिरछी किनारी और सितारों की आकाश गंगा होती हैं । असमिया बुनकर अपने मेखला, चद्दर, रिहा (महिलाओं द्वारा उपयोग किए जाने वाले परंपरागत कपड़े) और गमोसा (तौलिया) की किनारियों पर सुन्‍दर डिजाइनें बनाते हैं । असमिया समाज में युवतियों के लिए अपने प्रेमी के लिए बोहग बिहू (नव वर्ष की पूर्व संध्‍या पर) के अवसर पर अपने प्‍यार की निशानी के रूप में रेशमी बिहुअन (छाती पर लपेटने वाला कपड़ा) बुनने की परंपरा है ।

आंध्र प्रदेश, ओडिशा एवं गुजरात से इकात आता है । भारत में इकात तकनीक सामान्‍यत: गुजरात में पटोला, ओडिशा में बंधा और आंध्र प्रदेश में पगडू बंधू, वुड्डावासी एवं चितकीके नाम से जानी जाती हैं । इकता बंधेज रंगाई तकनीक में, फेबिक्र पर विभिन्‍नों रंगों में डिजाइनें या तो ताना धागों या बाना धागों या दोनों से बनाई जाती हैं । डिजाइन बनाने वाले धागे बांधे जाते हैं और अपेक्षित रंग लाने के लिए अलग-अलग रंग किए जाते हैं और धागों की सादा गुंथाई सर्वाधिक जटिल डिजाइन तैयार करती है, जो बुनाई पूरी होने पर ही दिखाई देती है । ओडिशा की इकात परंपरा आंध्र प्रदेश एवं गुजरात की इकात परंपराओं से पुरानी है और उनके अधिक लोकप्रिय रूपांकन शैली के अनुरूप मछलियां और रुद्राक्ष के मनके होते हैं । यहां पर रंगों में धागा-दर-धागा वृद्धि होती है । वास्‍तविकता में, ओडिशा इकात अब घागों की बंधेज रंगाई के नाम से जानी जाती है । आंध्र प्रदेश में, वे कुछ धागों का एक गुच्‍छा बनाते हैं और बंधेज रंगाई करते हैं और उन्‍हें डिजाइन की पूरी छूट होती है ।

कुछ लोग कहते हैं कि इकात एक अभिनव तकनीक है जो पहली बार भारत में विकसित की गई और बाद में इंडोनेशिया, जो सुदृढ़ इकात परंपरा का विश्‍व में अकेला दूसरा स्‍थान है, ले जाई गई ।

रंगो का उपयोग

बुनाई से पहले अवरोधित रंगाई, बंधेज-रंगाई एवं धागों की बंधेज रंगाई ग्रामीण कपड़ों की देशी रंगाई की बुनियादी तकनीकें थीं । लाल रंग के लिए लाख, काले के लिए लोहे का छीलन एवं सिरका, पीले के लिए हल्‍दी और हरे रंग के लिए अनार के छिलके उपयोग किए जाते थे ।

रंजकों के रूप में नील एवं मजीठ के कृत्रिम संश्‍लेषण से पहले, नीले एवं लाल रंग परंपरागत रूप से नील के पौधों एवं मजीठ (मजीठ की जड़) से निकाले जाते थे । ये परंपरागत भारतीय रगांई के मुख्‍य स्रोत थे । आज भी, आंध्र प्रदेश में कालमकारी कपड़े की रंगाई स्‍थानीय सब्‍जियों के रंग से की जाती है । गेरुआ, गहरा नीला और हल्का गुलाबी रंग स्‍थानीय मिट्टी, नील के पौधे और मजीठ की जड़ों से निकाले जाते हैं ।

प्रिंटिंग

आंध्र प्रदेश ने भारत में हाथ से प्रिंट किए गए कपड़ों के इतिहास में महत्‍वपूर्ण योगदान दिया है । प्रिंटिंग जमीन की पैदाइश है, इसके रंग स्‍थानीय पौधों के फूलों, पत्‍तियों एवं छालों से प्राप्‍त होते हैं और इसके रसायन मिट्टी, गोबर और नदियों की बालू से प्राप्‍त होते हैं ।

उत्‍तरी क्षेत्र में एक नई तकनीक विकसित की गई है जिसमें ताना धागों को लाइनबद्ध किया जाता है, करघे से बांधा जाता है और तब प्रिन्‍ट किया जाता है । ताना प्रिन्‍टिंग हरियाणा एवं उत्‍तर प्रदेश की खासियत है ।

ब्‍लॉक प्रिंटिंग के लिए शुष्‍क माह आदर्श मौसम होते हैं । उत्‍कृष्‍टता तभी हासिल होती है जब ब्‍लॉक नए एवं अच्‍छी तरह से तराशे हुए होते हैं । डिजाइनें कलाकारों द्वारा तैयार की जाती हैं और डिजाइनिंग को सूत की किस्म, उपयोग किए रंगों और बुनाई की तकनीकों नक्‍शाबंधों (ग्राफ-पेपर डिजाइनरों) की सीमाओं में रखा जाता है ।

भारत गृह सज्‍जा, घरेलू लिनन पर्दा चित्रयवनिका और रुचिकर बनावट एवं अलग-अलग मोटाई के आयतन की एक श्रृंखला का भी उत्पादन करता है, जो मिश्रित धागे का उपयोग करके ईजाद किये गए हैं ।

मुसलमानों को शुद्ध सिल्‍क पहनने की मनाही थी और मशरू एवं हिमरू के रूप में आधी सूती आधी सिल्‍क फेब्रिक इस वर्जित कार्य का प्रत्‍युत्‍तर थे ।

हथकरघा की व्‍यापक एवं रोमांचक रेंज को देखते हुए यह आश्‍चर्यजनक नहीं है कि भारतीय बुनकरों के शानदार एवं सुन्‍दर उत्‍पादों को ‘‘रंगीन फेब्रिक में उत्‍कृष्‍ट कविता’’ कहा जाता है ।

भारत की मानव जातीय बुनाई तथा प्रिन्‍ट

भारतीय हथकरघे अपनी संपन्‍नता, उत्‍कृष्‍ठता, किस्‍म और उत्‍तम गुणवत्‍ता के लिए प्रसिद्ध हैं। वे भारतीय संस्‍कृति का अभिन्‍न अंग हैं तथा त्‍योहार अथवा कोई अवसर उनके बिना पूरा नहीं होता। समय के साथ मोहकता, वैभव और उत्‍कृष्‍टता में बढ़-चढ़कर भाग लेने से, बुनाई, पद्धतियों तथा डिजाइनों में परिवर्तन आया है परंतु हथकरघों की महत्‍ता अभी भी वही है।

आर्थिक कार्यकलाप के रूप में, देश में हथकरघों के व्‍यापक लघु उद्योग हैं। देश में लाखों करघे भारत की कीमती धरोहर की पारंपरिक सुंदरता को बाहर निकालने में सूत, रेशम तथा अन्‍य प्राकृतिक रेशों की बुनाई में लगे हैं तथा साथ ही लाखों परिवारों को आजीविका प्रदान कर रहे हैं। मुश्‍किल से कोई गॉंव ऐसा होगा जहॉं क्षेत्र की पारंपरिक सुंदरता की बुनाई के लिए कोई बुनकर न हो, ये कौशल और कार्यकलाप पीढ़ी दर पीढ़ी कौशलों को देकर जीवित रखे जाते हैं। इसके अलावा हमारे हथकरघा और उत्‍कृष्‍ट कार्यशीलता, रंग संयोजन तथा उत्‍कृष्‍ट गुणवत्‍ता वाले हैं।

भारतीय बुनकर कपड़े में अपीलिंग आयाम लाने के लिए पौराणिक, विश्‍वास, प्रतीकों और कल्‍पना को मिश्रित करते हैं। यह कला, बुनाई तथा शिल्‍प में रंग के उपयोग का विशिष्‍ट रूप है जो प्रत्‍येक क्षेत्र को उसकी विशिष्‍ट पहचान और अनुपमता देता है। आज, समकालीन रेशों, आधुनिक डिजाइनों तथा बुनाई की नई तकनीकों का प्रयोग कर के किस्‍में तैयार की जाती हैं।

भारत की लोकप्रिय बुनाई

आंध्रप्रदेश

आंध्रप्रदेश अपने हथकरघे के लिए प्रसिद्ध है। यह शिष्‍ट और विशिष्‍ट डिजाइनों वाली अत्‍यधिक विशिष्‍ट साड़ियां तथा ड्रेस-सामग्रियां उत्‍पादित करता है। प्रत्‍येक साड़ी जटिल पल्‍लू वाली तथा सोने के धागे से गुथे प्रिन्‍ट बार्डर वाली होती है। पोचमपल्‍ली, वेंकटागिरी, गडवाल, नारायणपेट, धर्मवरम, उप्पादास के करघे पूरे भारत में अपने रेशमी और सूती साडियों के लिए जाने जाते हैं। मंगलागिरी सूती और कल्‍भकरी प्रिंट राज्‍य की अन्‍य किस्‍में हैं। आमतौर पर, करघा और कपड़ा दोनों स्‍थान के नाम से जाने जाते हैं।

बिहार

बिहार टसर रेशम से जाना जाता है जो एक गैर शहतूती रेशम की किस्‍म और हाथ से बुना सूती मलमल है। बुनकर समुदाय ने अनोखे कम गुंथे टसर रेशम धागे देने हेतु टसर रेशम कताई में उच्‍च स्‍तरीय रेशम विकसित किया जिसने टसर संरचित रेशम वस्‍त्र की विशेषताओं के सृजन में सहायता की, जो अनुपम है। उत्‍कृष्‍ट सूती कपड़ों के चाहने वालों में पेंटिंग की तरह मधुबनी के मलमल की सनक है।

छत्‍तीसगढ़

छत्‍तीसगढ का ‘कोसो’ टसर की एक किस्म है। इसमें भिन्‍न-भिन्‍न बुनाई पद्धतियां होती हैं जो हैं-काली प्रिंटिड, पेन्‍टिड अथवा कशीदाकारी मजबूत कोसा धागा जो गिच्‍चा कहलाता है, मोटा होता है तथा और अधिक टिकाऊ भी । यह रेशम अपनी शुद्धता और संरचना के लिए मूल्‍यवान होता है। कोसा रेशम कोकुन विशेषकर अर्जुन, साजा अथवा साल वृक्षों पर पाले गए कोकुन से लिया जाता है। यह गोल्‍ड-पेल, गहरे, शहद, पिंगल, बैकोटो निएज, क्रीमी आदि प्राकृतिक शेडों में उपलब्‍ध होता है।

गुजरात

गुजरात अपने पटोला प्रिन्‍ट के लिए मशहूर है। इसमें टाई व डाई तकनीक होती है जिसमें इसको महंगा और अनन्‍य बनाने हेतु जटिल बुनाई की जरूरत होती है, वे अपने फ्लेमिंग वाइब्रेंट रंगों तथा लोक अभिप्राय से अलंकृत ज्‍यामितीय डिजाइनों के लिए प्रसिद्ध हैं, गुजरात हथकरघे वनस्‍पति डाइयों तथा प्रसिद्ध कच्‍छ कशीदाकारी के उपयोग के ब्‍लाक प्रिंटों के लिए भी मशहूर है।

जम्‍मू व कश्‍मीर

जम्‍मू व कश्‍मीर अपनी प्रिन्‍टिड शुद्ध रेशम, क्रेप और शिफान साडियों, कशीदा बुनाई ड्रेसों, कुशल हस्‍त कशीदाकारी वाली पशमीना शालों के लिए लोकप्रिय है। ऊनी कपड़ा और कशीदाकारी इतनी अनुपम होती है कि उनका स्‍वामित्‍व रखने पर गर्व होता है, परिष्‍कृत रंग और सुस्‍पष्‍ट कशीदाकारी उन्‍हें प्रत्येक वर्ग के समूह में अत्‍यधिक लोकप्रिय बनाती है।

कर्नाटक

कर्नाटक शहतूती सिल्‍क की जन्‍मभूमि है । असली जरी किनारी के साथ मैसूर सिल्‍क की साड़ी प्रत्‍येक भारतीय महिला की स्वप्नधिकार होता है । राज्‍य में उपलब्‍ध अन्‍य साड़ियां छींटदार सिल्‍क, कसूती कढ़ाई वाली सिल्‍क की साड़ियां, बेलगामी साड़ियां हैं ।

मध्‍य प्रदेश

मध्‍य प्रदेश उत्‍कृष्‍ट चन्‍देरी सिल्‍क एवं माहेश्‍वरी साड़ियों की जन्‍मभूमि है। चन्‍देरी में करघों से उत्‍कृष्‍ट बुनाई से कोमल, सुन्‍दर रंग निकलते हैं । यहाँ पर, प्रसिद्ध चन्‍देरी साड़ियों को तैयार करने के लिए सिल्‍क का उपयोग ताना और सूत का उपयोग बाना के रूप में किया जाता है । माहेश्‍वरी शिल्‍पकारों ने चारखानों और डिजाइनों की व्‍यापक किस्मों को बुनने की कला में उत्‍कृष्‍टता हासिल कर ली है ।

महाराष्‍ट्र

महाराष्‍ट्र अपने समृद्ध एवं उत्‍तम पैठानी जरी वस्‍त्रों के लिए जाना जाता है जो उसे विरासत में मिले हैं और आज भी अनेक लोगों की संपत्‍ति है। ये सोने के सिक्‍कों या बिंदी के रूपांकनों के साथ विषम किनारी के साथ कुमकुम रंगों में होती हैं। मंडप डिजाइन वाली कोसा सिल्‍क में विदर्भ कारवती साड़ी अपनी बुनावट एवं डिजाइन के लिए प्रसिद्ध हैं जो अद्वितीय एवं मनोहारी होती हैं ।

औडिशा

औडिशा अपने सम्‍बलपुरी एवं बोमकई हथकरघों के लिए प्रसिद्ध हैं । सम्‍बलपुरी इकात दोहरी बंधेज रंगाई कला है जिसमें सिल्‍क एवं मर्सराइज्‍ड सूती धागे में बंधेज रंगाई तकनीक से पौराणिक कथाओं पर आधारित जटिल डिजाइनें होती हैं । बोमकारी एक अन्‍य विशेष किस्‍म है जिसमें किनारी की डिजाइनें जानवरों एवं फूलदार पैटर्न के साथ पौराणिक कथाओं पर आधारित होती हैं । उपयोग किए गए कपड़े की चमक के कारण इन हथकरघों की कीमत अधिक होती है और समय के साथ साथ ये मनोहरी भी लगते हैं।

राजस्‍थान

राजस्‍थान बंधानी अथवा बंधेज के लिए बहुत प्रसिद्ध है जो एक बंधेज रंगाई तकनीक ही है । लहरिया बंधेज रंगाई तकनीक की एक विशेष किस्‍म है जिसमें सूती कपडे, सिल्‍क, क्रेप, सिफॉन एवं कोटा डोरिया कपड़े पर तिरछी धारियां होती हैं । यह अपने सांगानेरी ब्‍लॉक, दाबु एवं बागरू प्रिंट के लिए भी प्रसिद्ध है । वैवाहिक एवं औपचारिक अवसरों पर गोटा, जरदोसी एवं जरी का उपयोग किया जाता है । पैबंदकारी का काम विशेषकर गृह सज्‍जा में लोकप्रियता हासिल कर रहा है ।

तमिलनाडु

तमिलनाडु की चेट्टीनाड एवं कोयम्‍बटूर के सूती कपड़े मशहूर हैं । ये परंपरागत किनारी के साथ धारियों एवं चौखानों में होते हैं जो सुन्‍दर एवं शानदार लगते हैं ।

उत्‍तर प्रदेश

उत्‍तर प्रदेश की लखनऊ चिकन कशीदाकारी बहुत प्रसिद्ध है । सूती, क्रेप एवं सिफॉन पर किये गए बढ़िया डिजाइन एवं कशीदाकारी, सामान्‍यत: हल्‍के रंगों में उपलबध होते हैं और सुन्‍दरता प्रतिबिंबित करते हैं ।

पश्‍चिम बंगाल

पश्‍चिम बंगाल की सूती कपड़े एवं सिल्‍क में बालूचारी एवं कांथा बेल-बूटा साड़ियां बड़ी आकर्षक होती हैं । बालूचारी साडियां हमारे गांवों की देहाती संस्‍कृति को दर्शाती हैं जबकि कांथा कशीदाकारी हमारें कारीगरों की सृजनात्‍मकता दर्शाती हैं । यह कशीदाकारी का आकर्षक रूप है जिसमें नजर, भाव और कौशल तीनों को एक में सम्‍मिलित किया गया है । राज्‍य की डेकाई टेन्‍गेल्‍स एवं बटिक लोकप्रिय सूती कपड़े हैं ।

हथकरघा

भारत में हथकरघों, बुनकरों और हस्तशिल्पों की बहुतायत है। हालाँकि इन कलाओं और शिल्पों के आधुनिक प्रौद्योगिकी से हारने और निर्माण के तेज एवं तीव्र तरीकों के बोझ तले दब कर इनके समाप्त हो जाने के खतरे हमेशा मौजूद रहे हैं लेकिन कई कलाएं एवं शिल्प आज भी मौजूद हैं और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हैं। ध्यानपूर्वक बुने एवं तैयार किए गए मैटीरियल को पाने का एक अलग ही अहसास होता है और आगे दर्शाई गई सात प्रकार की परंपरागत बुनाइयों के स्वदेशी उत्पादों का अपना विशेष अहसास है। अपने अगले मैटीरियल की खरीदारी से पहले इनमें से कुछ पर एक नजर डालिए।

1. बोमकाई हथकरघा

स्रोत: सुबर्नपुर, ओडिशा

आपको जानना चाहिए: इस शानदार बुनाई की जगमगाती विशेषता है उनकी बनाई साड़ी में धागे के काम से सजा बॉर्डर। धागे कम होते हैं लेकिन इस मैटीरियल पर बनाए गए पैटर्नों और डाई किए गए जगमगाते रंगों के कारण यह मैटीरियल बहुत लोकप्रिय है। प्रायः ये पैटर्न मैटीरियल में ही रंगों के कन्ट्रास्ट में बुने जाते हैं, जिससे यह मैटीरियल आम कपड़े से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। अब भी सोच रहे हैं कि क्या यह बुनाई आपके लिए है? खैर, यह बुनाई मशहूर हस्तियों को बेहद पसंद है, इसलिए शायद समय आ गया है कि आप भी इसे लेकर देखें।

2. मंगलागिरी कॉटन

स्रोत: गुंटूर, आँध्र प्रदेश

आपको जानना चाहिए: साड़ियों में इसका इस्तेमाल लोकप्रिय है और अधिकांशतः इसकी विशेषता छोटे-छोटे चैक वाले डिज़ाइन होते हैं, कई बार इसमें पट्टियां होती हैं जो कि आसानी से दिखाई नहीं देती हैं। यह बुनाई बहुत बढ़िया होती है और आमतौर पर इसके रंग भी वाकई बहुत चमकदार होते हैं। आमतौर पर हथकरघों में धागों की गिनती 80-80 या 40-40 होती है, जिसका निर्धारण इस आधार पर होता है कि बुना गया कपड़ा कितना सख्त या मुलायम है। यह कपड़ा सामान्यतया क्रिस्प कैटेगरी में आता है, जिससे इस कपड़े के उत्पाद काफी सख्त लेकिन टिकाऊ होते हैं।

3. टसर सिल्क

स्रोत: झारखंड

आपको जानना चाहिए: क्या आपने रेशमकीटपालन के बारे में सुना है? यह बुनियादी तौर पर रेशमकीटों के लार्वा से निकलने वाले प्रोटीन से बने कपड़े का उत्पाद होता है। इसी प्रकार यह शानदार भारतीय बुनाई तैयार होती है, जिससे प्राकृतिक रूप से सोने के रंग वाला कपड़ा बनता है। बेशक इसे रंगा भी जा सकता है लेकिन यह अपने-आप में हैवी टैक्स्चर के साथ भी काफी शानदार होता है। इस कपड़े को केवल ड्राई क्लीन किया जा सकता है और यह कपड़ा बहुत नाजुक होने के साथ-साथ सख्त भी होता है और परंपरागत परिधानों में इस्तेमाल किए जाने पर यही विशेषताएं इसे खूबसूरत बनाती हैं। इसके रिच, कोएर्स टैक्स्चर के कारण यह दिखता भारी है लेकिन आपकी त्वचा पर यह बहुत हल्का महसूस होता है, जिससे भारत के मौसम के लिए यह कपड़ा पूर्णतः उपयुक्त बन जाता है। पश्चिम बंगाल जैसे स्थानों पर इस हथकरघे का इस्तेमाल काँठा कशीदाकारी के लिए किया जाता है। यदि आप टसर सिल्क जैसी कोई चीज खोज रहे हैं लेकिन चाहते हैं कि वह कपड़ा टसर सिल्क से बहुत ज्यादा आरामदेह और बेहद हल्का हो तो आप कोसर (छत्तीसगढ़ के चम्पा से) का चुनाव कर सकते हैं। इसका उत्पादन रेशम कीट जैसे एक अन्य कीट से होता है, इसलिए यह उतना विशेष नहीं होता है। यह कपड़ा मुलायम लेकिन मजबूत है, इसलिए आप जानते हैं कि इस मैटीरियल के कपड़े अधिक लंबे समय तक चलेंगे। यह पूरी तरह प्राकृतिक मैटीरियल है और यदि आप मूलतः डल गोल्ड शेड (बिल्कुल टसर जैसी) इस्तेमाल न भी करना चाहें तो आप डाई किए हुए विकल्पों का चुनाव कर सकते हैं – और तब भी वह मैटीरियल प्राकृतिक रहता है क्योंकि वे शेड आमतौर पर पराग और फूलों के बाई-प्रोडक्ट से बनते हैं।

4. पैठानी जरी

स्रोत: औरंगाबाद, महाराष्ट्र

आपको जानना चाहिए: इस बुनावट के मैटीरियल का नाम उस शहर के नाम पर है, जो शहर इसका स्रोत है (पैठान) और यह मैटीरियल आमतौर पर विभिन्न रंगों के तैयार उत्पादों के रूप में मिलता है, जिससे ये बुनावटें सबसे ज्यादा मनमोहक बुनावटों में शामिल मानी जाती हैं। तथापि, चूँकि इन्हें बेहद बढ़िया रेशम से बनाया जाता है और इसीलिए ये उत्पाद बहुत विलासी और बहुत लोकप्रिय किस्म के होते हैं। इस बुनावट को तैयार करने की प्रक्रिया एक प्रकार की रेशम की बुनाई होती है लेकिन इसे इतना ज्यादा लोकप्रिय बनाने वाली विशेषता यह है कि इसे जरी से बुना जाता है, जिसके कारण इसमें इतनी चमक आ जाती है। हालाँकि इसकी सस्ती किस्में भी उपलब्ध हैं लेकिन यह आमतौर पर काफी महंगा कपड़ा होता है, जिसमें थोड़े बहुत अंतर के साथ रंग लंबाई या चौड़ाई में होते हैं, जिससे इंद्रधनुषी प्रभाव उत्पन्न होता है। इस मैटीरियल की बुनाई में अन्य सभी मैटीरियल से ज्यादा समय (कई महीने) लगता है।

5. महेश्वरी हथकरघा

स्रोत: महेश्वर, मध्य प्रदेश

आपको जानना चाहिए: यह परंपरागत बुनावट के ही बराबर शाही (रॉयल) है। यह लोकप्रिय बुनावट रेशमी या सूती धागे से तैयार की जाती है, जिन्हें आमतौर पर मिलाकर मोटे धागे के रूप में बुना जाता है और फिर उस मोटे धागे से वाकई मुलायम, शानदार दिखने वाला हैंडलूम मैटीरिलय बुना जाता है। अंत में तैयार उत्पाद बहुत सघन बुनावट के रूप में सामने आता है और हालाँकि अन्य अधिकांश हथकरघों से चमकदार रंगों के कपड़े तैयार होते हैं, आप इनमें हरे या गुलाबी रंग के नर्म लेकिन बोल्ड शेड पाएंगे। कई बार इस मैटीरिलय में चैक और पैटर्न बुने जाते हैं, जिनसे यह मैटीरिलय और भी ज्यादा विशिष्ट बन जाता है। अन्य अधिकांश परंपरागत बुनावटें तो साड़ियों के लिए ही उपयुक्त हैं लेकिन यह बुनावट साड़ियों के अलावा सलवार सूट बनाने के लिए भी बहुत लोकप्रिय है।

6. पोचम्पल्ली इकैत

स्रोत: हैदराबाद, आँध्र प्रदेश

आपको जानना चाहिए: हालाँकि इकैत एक प्रकार की डाई है, जो कि बुनाई से भी पहले की जाती है, जिससे कि वह बुनाई का ही हिस्सा बन जाती है। इकैत से बुना मैटीरियल सुंदर होता है और यह प्रक्रिया हाथ से की जाती है, जिसमें काफी समय लगता है। यह रंगों के साथ या रंगों के बिना भी तैयार किया जा सकता है और जब पोचम्पल्ली मैटीरियल तैयार हो जाता है तो इसमें आकर्षक पैटर्न भी दिखाई देते हैं। इस मैटीरियल पर कई मोटिफ होते हैं। जब पोचम्पल्ली से परिधान तैयार किया जाता है तब आमतौर पर उसपर भारी ईकैत-प्रिंट वाले बॉर्डर भी लगाए जाते हैं। वे हाथ से बुने गए अधिकांश टैक्सटाइल से ज्यादा चिकने और काफी महंगे होते हैं। इस प्रक्रिया के कई रूप हैं – जैसे कि वार्प, वेफ्ट और डबल, इसलिए आप अपने बजट तथा अपनी इस पसंद के अनुसार किसी रूप का चयन कर सकते हैं कि आपको पैटर्न दिखाई देने चाहिएं या नहीं।

7. पटोला बुनावट

स्रोत: पाटन, गुजरात

आपको जानना चाहिए: इकैत की ही तरह यह भी ऐसी बुनावट है, जिसमें प्रिंट शामिल है। लेकिन हमारी सूची में इसके इतने महत्त्वपूर्ण होने का कारण यह है कि यह कला धीरे-धीरे दम तोड़ रही है। इसका कारण यह है कि यह ऐसी प्रक्रिया नहीं है, जिसे हर किसी को सिखाया जाता हो और यह बहुत ज्यादा पारंपरिक कला है। यह प्रक्रिया ही कभी भी अपने मूल स्थान से किसी अन्य स्थान की ओर नहीं गई – हालाँकि इसकी नकल की जाती है। इसी कारण से बुनावट का यह तरीका पूरी तरह से समझाया नहीं जा सकता है लेकिन हम जानते हैं कि यह डबल इकैत शैली जैसी ही है और रेशम से बनाई जाती है। हम आपको इतना ही बता सकते हैं कि अंत में तैयार उत्पाद कई सुंदर, जगमगाते रंगों में मिलते हैं तथा यह बुनावट काफी सख्त और सघन रूप से बुनी गई है और इसमें जगमगाते भारतीय मोटिफ और डिज़ाइन भी अकसर शामिल किए जाते हैं।

गंतव्य

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* स्रोत: निकोल

हस्तशिल्प

हस्तशिल्प का अर्थ आमतौर पर दस्तकारी या कारीगरी होता है। कुशल लोग साधारण से औजारों की मदद से उपभोक्ता वस्तुओं से लेकर सजावटी वस्तुओं तक विभिन्न प्रकार की वस्तुएं कागज, लकड़ी, मिट्टी, सीप, चट्टान, पत्थर, धातु इत्यादि से बनाते हैं। इस प्रकार की वस्तुओं को हस्तशिल्प इस कारण से कहा जाता है कि ये वस्तुएं केवल हाथ से बनाई जाती हैं और इनके निर्माण में किसी मशीन का इस्तेमाल या तो किया नहीं जाता है या बहुत कम इस्तेमाल किया जाता है।

क्या हस्तशिल्प भारत में लोकप्रिय हैं?

भारत अपनी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। जहाँ तक कला और संस्कृति का संबंध है, भारत विश्व के सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देशों में शामिल है। यह भारत का सौभाग्य है कि यहाँ कुछ बेहद कुशल दस्तकार बसते हैं। उन्होंने विश्वभर में भारतीय हस्तशिल्प को प्रसिद्धि दिलाई है। अनेक ग्रामीण लोग आज भी अपनी सृजनात्मक कलाकृतियों से ही अपना जीविकोपार्जन करते हैं।

भारत में विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्प

भारत ऐसे विभिन्न प्रकार के हैंडीक्राफ्ट का निर्माण केंद्र है, जो कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी बेहद लोकप्रिय हैं। भारत की सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हस्तशिल्प कलाओं की चर्चा आगे की गई है: बैंबू हैंडीक्राफ्ट: बाँस से तैयार किए जाने वाले बैंबू हैंडीक्राफ्ट भारत की पर्यावरण के अनुकूल शिल्प कलाओं में शामिल है। ट्रे, टोकरियों, स्टाइलिश फर्नीचर इत्यादि जैसी उपयोगिता वाली वस्तुएं भी बाँस और केन से बनाई जाती हैं। 

बाँस से बनाई जाने वाली वस्तुओँ में टोकरियां, गुड़िए, खिलौने, चलनी, फर्नीचर, चटाइयाँ, वॉल-हैंगिंग, छतरियों के हैंडल, क्रॉसबो, खुरही, कुला, डुकुला, काथी, जेवरों के डिब्बे और भी कई अन्य वस्तुएं शामिल हैं। बैंबू हैंडीक्राफ्ट की वस्तुएं देश के अधिकांश भागों में बनाई जाती हैं।

बेल मेटल हैंडीक्राफ्ट: काँसे के जिस सख्त रूप का इस्तेमाल आमतौर पर घंटियां बनाने के लिए किया जाता है, उसे बेल मेटल कहते हैं। इस प्रकार के सख्त एलॉय का इस्तेमाल वर्मिलीयन बॉक्स, बॉउल, मोमबत्ती स्टैंड, दोनारी (पेंडेंट) और कई अन्य प्रकार की वस्तुएं बनाने के लिए किया जाता है। यह बेल मेटल क्राफ्ट अधिकांशतः मध्य प्रदेश, बिहार, असम और मणिपुर में पाया जाता है। मध्य प्रदेश में हस्तशिल्प के इस रूप को "जनजातीय शिल्प" माना जाता है।

बोन एंड हॉर्न हैंडीक्राफ्ट: ओडिशा राज्य में शुरू हुआ बोन एंड हॉर्न हैंडीक्राफ्ट पक्षियों और पशुओं की वास्तविक और जीवित दिखाई देने वाली आकृतियां बनाने के लिए प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त, पेन स्टैंड, जेवरों, सिगरेट केस, टेबल लैम्प, पेपर एंड सॉल्ट सेट, चेस सेट, नैपकिन रिंग, लॉफिंग बुद्धा इत्यादि जैसी वस्तुएं ओडिशा, कर्नाटक, केरल और उत्तर प्रदेश में बनाई जाती हैं।

पीतल हस्तशिल्प: पीतल की टिकाऊ वस्तुएं पीतल के बर्तनों की प्रसिद्धि बढ़ाती हैं। पीतल से बनी वस्तुएं, जैसे कि घुटनों के बल चलते कृष्ण, विभिन्न मुद्राओँ में भगवान गणेश की आकृतियां, गुलदान, टेबल-टॉप, छेदों वाले लैम्प, जेवरों के डिब्बे, हुक्के, खिलौने, शराब के गिलास, प्लेटें, फलों के बॉउल और कई अन्य वस्तुएं आज भी अनेक भारतीय घरों में व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल की जाती हैं। ये दस्तकार "कन्सारी" के नाम से प्रसिद्ध हैं। पीतल की वस्तुएं मुख्यतः राजस्थान में बनाई जाती हैं।

मिट्टी के हस्‍तशिल्‍प अथवा मिट्टी के बर्तन: सिंधु घाटी की सभ्‍यता के दौरान अपने संगठन के साथ, मिट्टी के शिल्‍प अथवा मिट्टी के बर्तनों को भारत में हस्‍तशिल्‍प के सर्वाधिक प्राचीन रूपों में से एक रूप में जाना जाता है। मिट्टी के बर्तन बनाने में लगे व्‍यक्‍तियों को ‘कुम्‍हार’ कहा जाता है। अपने विश्‍वप्रसिद्ध टेराकोटा रूप के अलावा, मृण्‍कर्म ने लाल मृण्‍पात्र, धूसर मृण्‍पात्र और काले मृण्‍पात्र जैसे विभिन्‍न रूप प्रदान किए हैं, उत्‍तर प्रदेश अपने पेन्‍ट किए हुए काले मृण्‍पात्रों के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा, पश्‍चिम बंगाल के कृष्‍णनगर, बीकानेर, लखनऊ, पुणे तथा हिमाचल प्रदेश में भी मिट्टी के बर्तन बनाए जाते हैं। मिट्टी के घड़े जैसी वस्‍तुएं सजावट की वस्‍तुएं, जवाहरात आदि पूरे देश में व्‍यापक रूप में उपयोग में लाई जाती हैं।

धोकरा हस्‍तशिल्‍प : हस्‍तशिल्‍प का सबसे पुराना रूप धोकरा अपनी पारंपरिक सादगी के लिए प्रसिद्ध है। यह आदिवासी हस्‍तशिल्‍प मध्‍यप्रदेश में उदभूत हुआ था। ऐसे हस्‍तशिल्‍पों को बनाने में लगे अन्‍य राज्‍य पश्‍चिम बंगाल, बिहार तथा उडीसा हैं। धोकरा अपनी लोकचरित्र चित्रांकन वाली अनोखी वस्‍तुओं के लिए प्रसिद्ध है। धोकरा जवाहरात, मोमबत्‍ती स्‍टैन्‍ड, कलमदान, ऐश ट्रे और शो पीसों के भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार प्रत्‍येक हस्‍तशिल्‍प की दूकान पर उपलब्‍ध हैं।

पटसन हस्‍तशिल्‍प : पटसन शिल्‍पकारों ने पटसन हस्‍तशिल्‍प के क्षेत्र में एक विश्‍वव्‍यापी झरोखे का सृजन किया है। पटसन शिल्‍प की व्‍यापक रेंज में बैग, कार्यालय लेखन-सामग्री, चूडियां और अन्‍य जवाहरात, जूते-चप्‍पल, वॉल हैंगिंग्‍स तथा और बहुत कुछ शामिल है। पटसन उत्‍पादनकर्ता के रूप में प्रमुख होने के नाते पश्‍चिम बंगाल, असम और बिहार भारत में पटसन हस्‍तशिल्‍प का नेतृत्‍व करते हैं।

कागज हस्‍तशिल्‍प : वाइब्रेन्‍ट रंगीन कागजों को पतंग, मास्‍क, सजावट के फूल, लैम्‍पशेड, कठपुतलियां, हाथ के पंखे आदि जैसे भिन्‍न-भिन्‍न शिल्‍प बनाने हेतु एक साथ जोडा जाता है। मुगल युग में विकसित कागज की लुगदी भी भारत में कागज हस्‍तशिल्‍प का एक प्रसिद्ध रूप है। यह शिल्‍प उद्योग मुख्‍य रूप से दिल्‍ली, राजगीर, पटना, गया, अवध, अहमदाबाद और इलाहाबाद में स्‍थित है। इसके अलावा, कागज शिल्‍पकार लगभग प्रत्‍येक प्रमुख कस्बे के बाहरी क्षेत्र में पाए जाते हैं।

पत्‍थर शिल्‍पकार:- राजस्‍थान, जयपुर, उड़ीसा और नागपुर, राज्‍यों में पत्‍थर नक्‍काशी के प्रचलन को एक प्राचीन पत्‍थर कला के रूप में देखा जा सकता है। राजस्‍थान, जयपुर और मध्‍यप्रदेश संगमरमर की पत्‍थर नक्‍काशी के लिए प्रसिद्ध हैं। हरे रंग के पत्‍थर पर कला मध्‍य प्रदेश की विशेषज्ञता है, जहॉं पत्‍थरकट्टी गया का अनुपम पत्‍थर शिल्‍प है। ओडिसा में युगों पुराने मन्‍दिर भारत में पत्‍थर शिल्‍प के विश्‍वप्रसिद्ध नमूने हैं। बर्तन, सजावटी टुकडे, पत्‍थर, जवाहरात और मूर्तियॉं पत्‍थर से बनीं हैं।

शेल (खोल) हस्‍तशिल्‍प:- अति प्राचीन समय से, शेल हस्‍तशिल्‍प भारत में एक मांगवाला शिल्‍प रहा है, शेल हस्‍तशिल्‍प कोंच शेल, कछुआ शेल और समुद्री शेल जैवी शैलों की तीन प्रकारों से बनाया जाता है। चूडियां, फॉर्क, सजावटी कटोरियां, लॉकेट, चम्‍मचें, बटन, परदे, दीपवृक्ष, दर्पण फ्रेम, मेजपोश, आदि जैसी भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार की वस्‍तुएं शैल शिल्‍प के उत्‍पाद हैं। आमतौर पर, मन्‍नार की खाड़ी, गोवा, ओडिशा आदि जैसे समुद्र के किनारों पर स्‍थित स्‍थान शैल हस्‍तशिल्‍प के स्‍थान हैं। चांदी जरदोजी अथवा मीनाकारी अथवा ताराकशी हस्‍तशिल्‍प चांदी जरदोजी अथवा ताराकशी चांदी अथवा सोने के गूंथे हुए धागों से सृजित हस्‍तशिल्‍प का एक सृजक रूप है। चांदी जरदोजी की मीनाकारी, खुल्‍ला जाल तथा फूल और पत्‍तियॉं तीन विशिष्‍ट प्रकार की हो सकती हैं। चांदी जरदोजी के सर्वाधिक प्रसिद्ध वस्तुओं में पानदान, चाय ट्रे, ट्रिन्‍केट बाक्‍स, कान की बालियॉं, हार, ब्रेसलेट और अन्‍य विभिन्‍न जवाहरात शामिल हैं। इसके अलावा, उडीसा में कटक, तेलंगाना में करीमनगर अपनी चॉंदी जरदोजी के काम के लिए प्रसिद्ध हैं।

बुनाई अथवा कढाई हस्‍तशिल्‍प: बुनाई मुख्‍यत: एक दूसरे के साथ क्रास की हुई बाना और लपेट के रूप में जानी जाने वाली दो धागों के सेटों द्वारा कपड़ा उत्‍पादन की प्रक्रिया से संदर्भित है। हस्‍तशिल्‍प का यह पारंपरिक रूप अधिकांशत: गुजरात, मध्‍यप्रदेश और राजस्‍थान राज्‍यों में पाया जाता है। बुनाई का प्रसिद्ध रूप बन्‍धनीज जामनगर और राजकोट में सृजित किया जाता है। बिहार और कर्नाटक अपने कशीदाकारी कामों के लिए प्रसिद्ध हैं।

काष्‍ठ हस्‍तशिल्‍प: काष्‍ठ हस्‍तशिल्‍प पत्‍थर मूर्तिकला के अस्‍तित्‍व में आने से पूर्व से भारत में प्रचलित है। कुशल शिल्‍पकारों द्वारा लकडी के टुकड़ों को आकार देकर भिन्‍न-भिन्‍न वस्‍तुएं बनाई जाती हैं। गुजरात, जम्‍मू और कश्‍मीर, कर्नाटक, केरल तथा उत्‍तर प्रदेश लकड़ी के कार्य के अपने अनोखे रूप हेतु प्रसिद्ध हैं। कुल्‍हाड़ियां, खिलौने, सजावटी पीस, जवाहरात और लैम्‍प शेड, मोमबत्‍ती स्‍टैन्‍ड, वरमिलियन बाक्‍स, चूड़ियों के होल्‍डर आदि जैसे बहुत से और अधिक डिजाइन के घरेलू सामान लगभग प्रत्‍येक भारतीय घर में प्रयुक्‍त कुछ आम काष्‍ठ शिल्‍प हैं।

भारत में हस्‍तशिल्‍पों के अन्‍य प्रकार

उपर्युक्त चर्चा के अलावा, भारत में प्रचलित अन्‍य हस्‍तशिल्‍प इस प्रकार हैं:-

  • तामचीनी हस्‍तशिल्‍प
  • शीशा हस्‍तशिल्‍प
  • किरीटमस हस्‍तशिल्‍प
  • लाख हस्‍तशिल्‍प
  • लेस अथवा जरी हस्‍तशिल्‍प
  • चमडा हस्‍तशिल्‍प
  • संगमरमर (मार्बल) हस्‍तशिल्‍प
  • धातु हस्‍तशिल्‍प
  • पेंटिंग हस्‍तशिल्‍प
  • पत्‍थर हस्‍तशिल्‍प
  • तिल्‍ला जूतियां

 

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सर्जनात्‍मक नील

किसी समाज से सुंदरता का विलोप हो जाने से वह नृशंस बन जाता है। सुंदरता के लिए मानव ललक ने शिल्‍प, बगीचों, अभिनय कलाओं, पाक-प्रणालियों, पवित्र रीति-रिवाजों, कला व शिल्‍प जैसी सौन्‍दर्यात्‍मक सर्जनात्‍मकता के आश्‍चर्यजनक रूप प्रस्‍तुत किए हैं। शताब्‍दियों से, सुन्‍दरता का सर्जन करने की इस ललक को दबाने में कोई समर्थ नहीं हुआ है। शिल्‍प इस प्रयोगात्‍मक सर्जनात्‍मकता तथा रूपों की कल्‍पना की निकासी का अभिन्‍न भाग है । यह हाथ के जरिए जीवंतता देने का मानव मस्‍तिष्‍क का विस्‍तार है- जिससे आमतौर पर स्‍थानीय संस्‍कृति, पर्यावरण, जीवनशैली और सामग्रियों से उत्‍पन्‍न एक भौतिक, वैज्ञानिक, बौद्धिक, भावनात्‍मक, ध्‍यान लगाने तथा पवित्र सृजन का परिणाम मिलता है। शिल्‍प उपयोगिता, सजावट, श्रृंगार, ध्‍यान और सौन्‍दर्य आदि सभी रूपों का एकीकृत रूप है। हाथ के कार्य की मानव गुणवत्‍ता शिल्‍प उत्‍पादों की कुशाग्र बुद्धि और विवेकी उपयोगिताओं की ओर संकेत करती है जो हाथ के काम की सहायता से अपने सर्जक तथा संवारने और शोभा बढ़ाने की सर्जनात्‍मकता की एबस्‍ट्रेक्‍ट गुणवत्‍ता तथा दैनिक जीवन में उपयोग की प्रशंसा करते हैं। आप ललित और विविध भारतीय लोकाचारों द्वारा सामूहिक रूप से प्रेरित अधिप्रमाणित कला और शिल्‍प पर पहुंच गए हैं। हम समग्र भारत में शिल्‍पकारों, मास्‍टर शिल्‍पियां, शिल्‍प कलस्‍टरों, स्‍वसहायता समूहों, एनजीओ तथा डिजाइनरों द्वारा हस्‍तशिल्‍प की गई रचनाओं को प्रस्‍तुत करते हैं। महिला ई हाट भारत के शिल्‍पों और शिल्‍पकारों का गुणगान करता है तथा शिल्‍प की सततता और शिल्‍पकारों तथा उनके समुदायों की आजीविकाओं पर सकारात्‍मक रूप से प्रभाव डालता है। जब आप इस स्‍थल से कुछ खरीदते हैं, तो आप समग्र भारत की महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्‍मनिर्भर बनाने में भागीदार बनते हैं । हमारी इस यात्रा का हिस्सा बनने के नाते आपको धन्‍यवाद ।

नील-श्वेत रचना का चुंबकीय आकर्षण होता है।

जब नील और श्वेत रचनाओं का आकर्षण अपने चरम पर हो तब प्राकृतिक और पौधों पर आधारित नील के प्रयोग की धीमी प्रक्रिया और रासायनिक डाई की तुलना में उसके अधिक गुणों पर विचार करना रूचिकर विषय बन जाता है। 

राष्ट्रीय और वैश्विक स्तरों पर डिज़ाइनर लगातार इस विषय पर काम कर रहे हैं। खुदरा विक्रेता नील रचनाओँ के कलैक्शन को रोकने के भरपूर प्रयास करते हैं। कोई भी परिधान खरीद कर पहन लो और तारीफों के पुल बँध जाते हैं। यह जादू तभी तक बरकरार रहता है जब तक कि उस कपड़े को धोया नहीं जाता है। तब शंकाओं का दौर शुरू होता है: रंग बरकरार रहता है, हर धुलाई के बाद और ज्यादा चलता है। कोई डाई नहीं, खुद करके देखें जैसी सलाहों से मदद मिलती है। कई बार तो कपड़े की धुलाई का भी इंतजार नहीं करना पड़ता है।

कटु सत्य यह है कि खुदरा क्षेत्र में कृत्रिम और रासायनिक नील का ही प्रयोग किया जाता है।

Tप्राकृतिक डाइयों से काम करने का कष्ट उठाने वालों को रासायनिक नील की तुलना में कठिनाइयों के दौर से गुजरना पड़ता है। जानकारियों के अभाव के कारण उपभोक्ताओं को धोखे में रखा जाता है। पौधों पर आधारित नील की तुलना में रासायनिक स्रोत से प्राप्त कृत्रिम नील कम महँगा होता है।

हाल के वर्षों तक कडपा बड़े नील के खेत पर गर्व किया करता था। “एक विदेशी ने वह खेत खरीद लिया और वह किसान अब खुदरा विक्रेता बन गया है।" यही है नील की विडंबना।

पौधे पर आधारित नील की एक किलो की टिकिया की लागत 2,000 रुपए तक होती है। 

नील का सबसे ज्यादा लोकप्रिय स्रोत तमिलनाडु है।

नील की टिकियाएं कुंडों में रखी जाती हैं और फिर ऐश वाटर, लाइम तथा अन्य घटकों से उन्हें संसाधित किया जाता है। यह तरल हरे रंग का होता है। “जब कोई कपड़ा उसमें डुबोकर बाहर निकाला जाता है और वह कपड़ा हवा के संपर्क में आता है तब ऑक्सीकरण होने से उसका रंग नीला हो जाता है। इसीलिए लोग नील को जादूई डाई कहते हैं।

श्रम-सघन प्रक्रिया

"आपकी पीठ, बाँहों पर कहीं भी नील के धब्बे पड़ सकते हैं, यदि वह रासायनिक हो। खेती करने से लेकर रंग निकालने तक, यह एक लंबी प्रक्रिया है। कपड़े में रंग की गहराई इस बात पर निर्भर करती है कि उस कपड़े को कितनी बार डाई में डुबोया गया है। गहरी आभा पाने के लिए कपड़े को 15 से 20 बार तक डाई में डुबोना पड़ सकता है। नील जिस प्रकार कार्य करता है, उसे देखकर मैं आज भी चमत्कृत हो जाता हूँ। बहुत कुछ होता है। जब आपको नील की टिकियाएं मिलती हैं तब आपको उनमें अशुद्धियों की जाँच करती पड़ती है। कल्पना कीजिए कि आप शिबोरी पैटर्न वाले कपड़े पर डाई से कार्य कर रहे हैं और अपने कार्य के अंतिम चरण में आपको यह पता चलता है कि रंग में मिट्टी मिश्रित है, लेकिन ऐसा बहुधा हुआ करता है। सभी शिल्पियों को यह जानकारी और विश्वास है कि जब प्राकृतिक रंगों को विधिवत लगाया जाता है तब वे निकलते नहीं हैं। “कपड़े को ब्लॉक प्रिंटिंग के विभिन्न चरणों में भी कुछेक बार धोया जाता है, इसलिए रंग निकलने की घटना कभी भी हो सकती है। थोड़ा भी अतिरिक्त रंग धुल कर निकल जाता है। प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल से तैयार उत्पाद के रंग निकलने नहीं चाहिएं। रंग को गर्म मौसम में दो दिन और ठंडे मौसम में चार से पाँच दिन तक सूखने दें।

नील को आसानी से नाजुक रंग कहा जा सकता है। इसे तैयार और डाई करने के समय भी प्यार और सम्मानपूर्वक संसाधित किया जाना चाहिए। इस प्रकार संसाधित किए जाने पर ही इसका छुपा हुआ जादू निखरकर बाहर आता है।

धीमा फैशन

तमिलनाडु के पॉकेटों, तेलंगाना, आँध्र प्रदेश, गुजरात और राजस्थान में परंपरागत तकनीकों का इस्तेमाल करने वाले बुनकर और ब्लॉक प्रिंटर प्राकृतिक नील का प्रयोग करते हैं। दो वर्ष पहले कच्छ के टैक्स्टाइल ट्रेल में भुजोड़ी में बुनकरों के वनकर परिवार द्वारा नील कुंडों का सावधानीपूर्वक प्रयोग देखा एवं समझा गया। कताई, बुनाई और रंगाई की ‘विधियां’ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँची। कच्छ में अजरखपुर और धमाड़का के ब्लॉक प्रिंटर प्राकृतिक डाई लगाने की धीमी प्रक्रिया का पालन करते हैं। वे यह कार्य तब से करते चले आ रहे हैं जब कि स्थायी और धीमे फैशन जैसे शब्द प्रचलित भी नहीं हुए थे। तथापि, कई प्रिंटरों ने अधिक कमाई और कम समयावधि में नए कलैक्शन तैयार करने के लिए स्क्रीन प्रिंटिंग और रासायनिक डाइयों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। 

ऐतिहासिक संबंध

अन्य सभी प्राकृतिक डाइयों की तरह नील का प्रयोग कई युगों से होता रहा है। हाल के वर्षों में स्वदेशी और हाथ से बुने कपड़ों तथा तकनीकों में रूचि बढ़ने से नील मुख्यधारा में आ गया है। नील का भारत से भावनात्मक संबंध है।

नील का पौधा पूरे स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश शोषण का स्थायी प्रतीक रहा है। इसके कारण किसानों को ब्रिटिश राज की अन्यायपूर्ण कार्य-पद्धतियों का विरोध करना पड़ा। महात्मा गाँधी ने बिहार के चम्पारण में नील किसानों पर लागू की गई तिनकथिया व्यवस्था की ब्रिटिश नीति के विरुद्ध अपना पहला सत्याग्रह शुरू किया। तब चम्पारण नील की खेती का सबसे प्रमुख स्थान हुआ करता था। यही सत्याग्रह आगे चलकर चम्पारण सत्याग्रह के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 

बिहार में चम्पारण आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम में उस आंदोलन का महत्त्व इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।

क्या कोई खरीदार प्राकृतिक नील से रंगे गए कपड़े और रासायनिक नील से रंगे गए कपड़े में फर्क बता सकता है? “यदि विक्रेता न बताए तो यह जानने का कोई तरीका नहीं है। प्राकृतिक नील से रंगे गए कपड़े अपनी श्रम सघन प्रक्रिया के कारण सस्ते नहीं होंगे। ब्लॉक प्रिंट किए हुए एक मीटर नील कपड़े की लागत 650 रुपए प्रति मीटर हो सकती है। सही तकनीक से प्राकृतिक नील का प्रयोग करने वाले कपड़े के रंग निकलते नहीं हैं। लंदन स्थित विक्टोरिया एंड एल्बर्ट म्यूज़ियम में भारत के शताब्दियों पुराने कलमकारी टैक्स्टाइल रखे हुए हैं, जिनमें मैडर और इंडिगो का इस्तेमाल किया गया है। नील से रंगे कपड़ों के कई संवेदनशील और जानकार ग्राहक जापान और अमेरिका में हैं। यह शुद्धता और प्रामाणिकता की चाहत ही है, जो कि प्राकृतिक रंगों की खूबसूरती को ज़िंदा रखने में मददगार होगी। हम भारतीयों को इस यात्रा में अपनी भूमिका निभाते रहना आवश्यक होगा।

 

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आखरी अपडेट - 21-02-2017


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